अपने जनजाति आरक्षण के हक और अधिकार के लिये वर्षों से संघर्ष कर रहे माझी-निषाद समाज को उपचुनाव के बाद माझी जनजाति का लाभ मिल सकेगा ?

  कांग्रेस ने उपचुनाव के अपने चुनावी घोषणा पत्र में प्रकाशित किया माझी जनजाति का मुद्दा तो बीजेपी अब भी दे रही है आश्वासन का झुनझुना। 



  मध्यप्रदेश में जारी 28 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव की प्रक्रिया और प्रचार-प्रसार जोर पकड़े हुए है। मध्यप्रदेश में होने वाले इस उपचुनाव की वजह कुछ खास है तो वह मात्र यह कि 15 महीने प्रदेश की सत्ता में बैठी कांग्रेस सरकार में उनकी ही पार्टियों के मंत्रियों और विधायकों की नहीं सुनी जा रही थी सो उन्होंने जनता के हितों को लेकर अनसुनी होती देख कांग्रेस सरकार से पल्ला ही झाड़ लिया। लोकतंत्र और राजनीति में जनता के हितों की अनदेखी को लेकर इस तरह के फैसले लिए जाने के निर्णय को लेकर सबके अपने अपने तर्क हैं, यही कुछ बात लाखों की संख्या में निवास करने वाले माझी निषाद समाज के ढीमर, कहार, केवट, मल्लाह, कश्यप, भोई, बाथम, रैकवार, सोंधिया सहित अन्य अपने अनुसूचित जनजाति के संवैधानिक हक और अधिकार की मांग को लेकर 1992 से लगातार आवाज उठा रहे हैं। माझी समाज को उसके हक और अधिकारों को लेकर प्रदेश के राजनीतिक दलों ने हर चुनावों के पहले इतने सब्जबाग दिखाये हैं किंतु जब उनपर कार्यवाही किये जाने की बात आई तो वह सब बातें केवल एक दिवास्वप्न बनकर रह गई और राजनीतिक दलों के द्वारा चुनावों में किये वायदों को अमलीजामा आज तक नहीं पहनाया गया है, पर राजनीतिक दलों में झंडा लेकर टोपी लगाकर बैठे हमारे लोग आज भी तय नहीं कर पा रहे हैं कि जो बीजेपी, कांग्रेस हमें 3 दशक से अपने संवैधानिक हक और अधिकार से वंचित किये हैं उसके बाद भी जबरन समाज को अभी भी इन दोनों दलों से आश्वासन और भरोसा दिलाकर समाज को चुनाव में भृमित करने का कार्य किया जाता है। जैसा की सब जानते हैं सत्ता में बैठे राजनीतिक दलों की कुछ अपनी नीतियां होती हैं जिनपर वह अपने अपने वोटों के गुणा भाग और समीकरणों के हिसाब से निर्णय लेते हैं। मध्यप्रदेश में भी इस समाज के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, जिसका खामियाजा समाज को आज भी भुगतना पड़ रहा है।
   मध्यप्रदेश की जीवन रेखा कही जाने मां नर्मदा, चंबल, सोन, वेतवा सहित इन सभी की सहायक नदियों के किनारे बसे  माझी-निषाद समाज के लोगों को आज भी भारी विपरीत परिस्थितियों में अपना जीवन यापन करना पड़ रहा है। माँ नर्मदा सहित प्रदेश की अन्य सभी नदियों में किये जा रहे बेतहाशा अवैध खनन से समाज के रोजी रोटी के साधन समाप्त हो चुके हैं, तो कई अन्य छोटी-छोटी नदियों ने भी अब दम तोड़ दिया है। जल आधारित माझियों के जीवकोपार्जन के साधन अब नहीं बचे जिसपर सरकार व उनके प्रतिनिधि कभी किसी मंच पर चर्चा नहीं करते, लाखों रुपयों की लागत से गांव-गांव खोदे गये तालाब भी अब दिखाई नहीं देते। जो कुछ तालाब हैं उनपर दबंगों और रसूखदारों ने कब्जा कर माझियों और वंशानुगत मछुआरों को केवल मजदूर बना कर रखा है। रेतवाड़ी के पट्टे दिये जाने की मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी चौहान की जबलपुर में वर्ष 2012 में की गई घोषणा और आदेशों पर न ही अमल हो रहा है न पट्टे दिये गये हैं। नावघाट ठेकेदारी प्रथा से चलाये जा रहें हैं, जिसमें समाज के लोग केवल मजदूरी कर रहे हैं।  देश के संविधान में 1950, 1956 में मिली माझी जनजाति की श्रेणी की सुविधा का लाभ प्रदेश के माझी-निषाद लोगों को नहीं मिल रहा है, इसके लिये समाज के अनेक संगठनों सहित अनेक वरिष्ठ समाजसेवियों के द्वारा सड़कों से लेकर न्यायालयों तक अपनी मांग दोहराई जाती रही है। इतना सब कुछ करने और लगभग 3 दशकों से माझी जनजाति आरक्षण की मांग करते हुए समाज आज भी उसी जोश और जुनून से अपने हक और अधिकार की बात उठा रहा है, मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी ने माझियों के इस मांग के अभियान को दिग्भ्रमित करने हेतु अपने-अपने दलों में मछुआरों के नाम पर प्रकोष्ठ का गठन कर उनकी समस्याओं को निराकरण करने का लॉलीपॉप भी दिया है। किन्तु राजनीतिक दलों के इन प्रकोष्ठ के माध्यम से वर्षों से चली आ रही माझी आरक्षण की मांग को लेकर कोई कार्ययोजना बीजेपी कांग्रेस के पास आज भी नहीं है। प्रदेश के कुछ जिलों में माझी निषाद समाज के लोगों को 1950 से मिली जनजाति की सुविधा के नाम पर कुछ प्रमाणपत्र ही जारी हुए हैं, किन्तु अधिकतर लोग आज भी संवैधानिक अधिकार से वंचित हैं। प्रदेश में जिस भी दल की सरकार रही उसके मुख्यमंत्री ने माझियों को आरक्षण दिये जाने को लेकर सार्वजनिक मंचों से घोषणाएं भी कीं, किन्तु उनके द्वारा इस सम्बंध में आदेशों को निकाले जाने का इंतजार आज भी किया जा रहा है। वर्ष 2003 में राज्य मंत्री परिषद में एक प्रस्ताव के माध्यम से माझी की उपजातियों को पिछड़े वर्ग की सूची के क्रमांक 12 से विलोपित करने के प्रस्ताव पर सहमति बन गई थी, किन्तु उसके बाद आज 17 साल बीत जाने के पश्चात उस प्रस्ताव पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई।        महत्वपूर्ण बात यह भी है कि प्रदेश में अन्य जातियों के मामले में उनकी उपजातियों को विलोपित कर उन्हें अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल कर लिया गया है किंतु मध्यप्रदेश में पिछड़ा वर्ग की सूची में क्रमांक 12 पर दर्ज ढीमर, कहार, केवट, भोई, मल्लाह, निषाद आदि के विलोपन किये जाने को लेकर मध्यप्रदेश की सरकार की पिछड़ा वर्ग अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के जिम्मेदार भी नोटशीट लिख चुके हैं, किंतु उसके बावजूद भी पिछड़े वर्ग की सूची से माझी की उपजातियों को विलोपित नहीं किया जा रहा है। ऐसे में लगता है कि बीजेपी सरकार की मंशा यह है कि वह केवल अपने लोक लुभावन वादों और घोषणा करके प्रदेश के माझियों की वोट लेती रहे, बाकी उन्हें जो आरक्षण का लाभ है वह कब मिलेगा इसकी कोई तिथि तय नहीं है। हां जब भी चुनाव आते हैं हमारे बीच के ही लोग राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के खास बनकर समाज की ठेकेदारी के नाम पर उन्हीं राजनीतिक दलों की रैलियों और सभाओं में समाज को उनकी भीड़ का हिस्सा बनाकर अपना हित साधते हैं।
   फिलहाल उपचुनाव के चलते माझियों के नेता बनकर अपनी अपनी राजनीतिक पार्टियों का हित साधने वालों से उपचुनाव के बाद समाज इस बात का जबाब सार्वजनिक मंचों से जरूर मांगेगा, कि उनकी पार्टी की सत्ता में ताजपोशी के बाद माझी की उपजतियों को लेकर उनकी नीति क्या है और समाज को अन्य लाभ किस प्राथमिकता से मिलेंगे ?
अमर नोरिया ( पत्रकार )
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)